सोमवार, सितंबर 27, 2010

पाठक की चिठ्ठी

वेसे तो चिठिया आती रहती है  परन्तु नीलम शर्मा अंशु के लेख पर एक पाठक की चिठ्ठी आई तो लगा की इस ब्लॉग का बनाना सार्थक हो गया जिज्ञासावस उनके प्रोफाइल पर जा कर ब्लॉग  तक पहुचे तो महसूस हुआ की उनके शब्दों में अपनत्व तो है ही साथ सार्थकता भी है और धार भी !उनके विचार यहाँ प्रस्तुत है इस आग्रह के साथ की उनकी जिज्ञासा कोई पाठक पूरी कर सके तो आत्म संतोष मिलेगा की आकाशवाणी की सार्थकता
अभी बनी हुई है उनके विचार आप भी पढ़े 
टी.वी. की बनिस्बत रेडियो आज भी हमारी पहली पसंद है। लेख बहुत अच्छा लगा आपका, लेकिन एक व्यक्तिगत समस्या आपकी समक्ष रखता हूँ। शायद 1988-89 की बात है, आकाशवाणी दिल्ली से एक नज़्म सुनी थी। उस समय कालेज से घर आया था और उद्घोषणा हो चुकी थी, इसलिये गायक का नाम नहीं सुन पाया, इतना मालूम है कि कोई मुस्लिम कलाकार थे। उस समय अपनी याददाश्त का इतना भरोसा था कि ज्यादा खोजबीन नहीं की, अब पछताना हो रहा है। नज़्म कुछ इस तरह से थी -


 "प्यार की शाम ढली, आशियां दिल का जला,
 मुझको आवाज न दे, तेरी दुनिया से चला। 
कोई उम्मीद नहीं, कोई अरमान नहीं,
 प्यार का दिल में मेरे, कोई तूफ़ान नहीं, 
राख का ढेर बना, मेरे ख्वाबों का महल,
 हाय बेरंग हुए, आरजुओं के कंवल,
 दीप यादों के बुझे, आस दम तोड़ गई,
 मेरे होठों की हंसी, मुझसे मुंह मोड़ गई, 
मैं तो बरबाद हुआ, हो मगर तेरा भला, 
मुझको आवाज न दे, तेरी दुनिया से चला" 


शुरुआती लाईन्स बिल्कुल सही हैं, पैरे में कुछ गलतियाँ हो सकती हैं। मैंने बहुत खोजा है इस गीत को, नहीं मिला। आपका लेख पढ़कर फ़िर से कोशिश की है, आप जुड़ी रही हैं आकाशवाणी से, समयकाल भी लगभग वही है। अगर संभव हो सके तो कुछ जानकारी दीजियेगा, आपके सोर्सेज़ हम जैसे लोगों से तो ज्यादा ही होंगे। धन्यवाद दे रहा हूँ, अगर गीत मिल जायेगा तो एक बार और धन्यवाद दे दूँगा। आभार

3 comments:

अमित शर्मा ने कहा…

बिलकुल सही कह रहे है आप हमारे जैसे हो हल्ला मचाने वाले ब्लॉग तो खूब मिल जायेंगे, पर कुछ सार्थक लेखन करने वाले या सामाजिक सरोकारों की पूर्ती करने वाले ब्लाग कम ही है. कभी समाज के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे आकाशवाणी से सरोकार रखकर आपने यह ब्लॉग बनाया है, आशा है इस ब्लॉग की मार्फ़त कुछ भूले-बिसरी स्मृतियों की ताजगी के साथ ताजा उठान भी आकाशवाणी का हो सकेगा.
और हाँ संजयजी की खोज को आगे बढ़ाने की गरज से मेरी जानकारी के सारे ग़ज़ल/कविता सम्बंधित ब्लोगों पे जानकारी के लिए निवेदन किया है देखतें है, क्या सफलता मिलती है

मो सम कौन ? ने कहा…

नमस्कार,
जिसे कोई नहीं पूछता था, यहाँ(ब्लॉग जगत) में उसकी भी इतनी कद्र हो रही है कि एक कमेंट से खुश होकर एक पोस्ट ही बन गई। और लोग कहते हैं कि ये आभासी जगत बहुत बेकार है। अपना तो यहाँ आठ दस महीने का अनुभव बहुत ही अच्छा रहा है। उस दिन नये चैट्ठों में इस नाम का चिट्ठा देखा तो अपनी दबी हुई इच्छा जाहिर कर दी। सच कहूँ तो आशा भी नहीं थी कि सुनवाई होगी। लेकिन बाद में देखने आया तो इस पोस्ट पर नजर पड़ी। खुद पर गर्व, शर्मिन्दगी सब भाव बीत गये।
यकीन मानिये, ऐसे कमेंट से ब्लॉग की सार्थकता नहीं बढ़ी, टिप्पणीकार की सार्थकता बढ़ी है।
कहते हैं जहाँ चाह है, वही राह है। आपको कमेंट करने के शायद एक या दो दिन बाद रेडियोनामा की साईट पर देखा तो लिखा देखा, "’समापन हुआ मजीद शोला कव्वाल की इस क़व्वाली से - प्यार की शाम ढली।’"
रेडियोवाणी वाले यूनुस खान साहब से कई महीने पहले एक बार इसी रचना की बात चली थी ति उन्हें फ़ौरन उस आशय का मेल कर दिया, "युनुस साहब,
नमस्कार.
शायद याद हो आपको कि एक आल्हा का और एक नज़्म ’प्यार की शाम ढली’ की फ़रमाईश आप पर बाकी है। हा हा हा।
आज थोड़ी सी जानकारी के साथ आया हूँ। रेडियोनामा की साईट पर ये पंक्तियां मुझे मिली हैं - ’समापन हुआ मजीद शोला कव्वाल की इस क़व्वाली से - प्यार की शाम ढली।’ लेख अन्नपूर्णा जी का है, और आप भी इस साईट के सदस्य हैं। लिंक निम्नवत है -

http://radionamaa.blogspot.com/2010/03/18-3-10.html"
उनका जवाब आया है कि कुछ दिनों में ही यह कव्वाली रेडियोवाणी पर सुनने को मिलेगी। सुनने के बाद ही पता चलेगा कि यह वही आईटम है जो मुझे इतने सालों से हांट कर रहा है या नहीं? शायद सही समय का इंतजार ही चल रहा था। अब आपने और अमित जी ने भी बीड़ा उठा लिया है तो इसे हासिल करके ही रहेंगे।
आप का बहुत बहुत धन्यवाद, बात सुनने का और आभार मानने का। कायदे से आभार तो मुझे मानना चाहिये। फ़िर से शुक्रगुज़ार हूँ।

क्या इस नज़्म\कव्वाली को उपलब्ध करवा पायेंगे अब?

मुझे तो लगता है कि आधी लड़ाई जीत ली है मैंने।

आभारी
संजय।

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http://mosamkaun.blogspot.com/

alka sarwat ने कहा…

लेकिन ये तो बहुत पुरानी पोस्ट है
कुछ नया क्यों नहीं लिख रहीं.