सोमवार, जुलाई 26, 2010

आज के परिपेक्ष्‍य में आकाशवाणी

आज प्रतियोगिता का दौर है। हर क्षेत्र में प्रतियोगिता है। अनेक आकाशवाणी केन्‍द्र खुल गए है। निजी और सरकारी क्षेत्र में रेडियों स्‍टेशन है। टेलिविजन के क्षेत्र में निजी चेनल अपनी गहरी पैठ बनाते जा रहे है। ऐसे में आकाशवाणी की क्‍या प्रांसगिकता हो सकती है। पाठकों के लिए यह प्रश्‍न है। आप रेडियों को कितना समय देते है।  किन कार्यक्रमों में आपकी रूचि है पाठको से जानना चाहेगे। आशा है आप इस पर प्रकाश डालेगे।

8 comments:

E-Guru Rajeev ने कहा…

अब रेडियो कौन सुनता है !
वह भी आकाशवाणी !!

E-Guru Rajeev ने कहा…

पर आप लगे रहिये, यह आपके जुझारूपन, सुधारवादी और प्रगतिवादी होने को दर्शाता है.

हिन्दी ब्लॉगजगत के स्नेही परिवार में इस नये ब्लॉग का और आपका मैं ई-गुरु राजीव हार्दिक स्वागत करता हूँ.

मेरी इच्छा है कि आपका यह ब्लॉग सफलता की नई-नई ऊँचाइयों को छुए. यह ब्लॉग प्रेरणादायी और लोकप्रिय बने.

यदि कोई सहायता चाहिए तो खुलकर पूछें यहाँ सभी आपकी सहायता के लिए तैयार हैं.

शुभकामनाएं !


"हिन्दप्रभा" - ( आओ सीखें ब्लॉग बनाना, सजाना और ब्लॉग से कमाना )

E-Guru Rajeev ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
E-Guru Rajeev ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
दुलाराम सहारण ने कहा…

भारत का किसान अब भी रेडियो सुनता है। रात के पौने नौ के समाचार आज भी उसे दुनिया से जोड़कर जागरूक बनाए हुए हैं। भेड़-बकरी चराते हुए चरवाहे संगीत की स्‍वर-लहरियां रेडियों के साथ ही जोड़ते हैं।
गांव की गुवाड़ के बीच रेडि़यो की आवाज एक स्‍थाई स्‍वरूप धारण कर चुकी है।

किसानवाणी कार्यक्रम से किसान खेती की किस्‍मों का चयन कर रहे हैं। महिलाजगत से महिलाएं बहुत कुछ सीख रही हैं। युवावाणी में पत्रों के ढेर नयी पीढ़ी का जुड़ाव साबित कर रहे हैं।

मात्र, सभ्‍य समझे जाने का ढोंग करने वाले कतिपय तबके में ही रेडियो गायब हुआ है।

आकाशवाणी जिंदा है, और रहेगी। एफएम के प्रयोग जरूर समय के साथ उसे अपनाने होंगे।


आपका प्रयास बेहतरीन है। साधुवाद।

samvetswar.blogspot.com ने कहा…

टिप्पणी नं.1 पढ़कर बहुत बुरा लगा (जो रेडियो को दिल से चाहता होगा उसे सचमुच बुरा लगना ही चाहिए यह सुनकर कि रेडियो सुनता कौन है) हलांकि अगले मिनट में ही उन्होंने कमेंटस् बदल लिए हैं और टिप्पणी 1 का जवाब तो टिप्पणी 3 के माध्यम से स्वत: स्पष्ट है। मान भी लिया कि रेडियो की लोकप्रियता में कमी आई है लेकिन FM ने रेडियो की दुनिया ही बदल दी है ख़ास तौर से महानगरों में। लोग गाडियों में, टैक्सियों में, ऑटोज में एफ.एम. लगाए रखते हैं और मेंरे जैसे लोग ऑफिस जाते और लौटते वक्त मोबाइल पर सुनते हैं। आपके आस-पास के शहरों का मैं नहीं कह सकती लेकिन कोलकाता और आस-पास के लोग दीवनगी की हद तक रेडियो एफ.एम. सुनते हैं। उनकी दीवानगी के आलम को मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती। प्रोग्राम में SMS, फोन तो करते ही है चिट्ठियां भी दीवानगी की हद तक ही लिखते हैं। हिन्दी के प्रोग्राम में बांग्ला भाषी श्रोता रोमन हिन्दी में खत लिखने की कोशिश करते हैं। चब तक आकाशवाणी के FM पर हिन्दी प्रोग्राम छायालोक चल रहा होता है लोग दूसरा प्राइवेट चैनेल ट्यून नहीं करते, ऐसा हमारे श्रोता हमें खुद बताते हैं। हम खुद भी प्रोग्राम पर बहुत मेहनत करते हैं।

हमारे कोलकाता में तो आकाशवाणी की उर्दू सर्विस शॉर्ट वेव पर लगती है जो कि स्पष्ट नहीं होती। मैं निजी तौर पर उसे बहुत मिस करती हूँ क्योंकि मैं 1989 से AIR उर्दू सर्विस की श्रोता रही हूँ और कोलकाता आने के बाद ही सुनना छूटा है क्योंकि यहाँ frequency ठीक नहीं आती। अब भी जब मैं दिल्ली या पंजाब जाती हूं तो नियमित रूप से उर्दू सर्विस और विविध भारती के प्रोग्राम सुनती हूँ। कभी हमारे घर का नज़ारा ये होता था कि एक कमरे में TV चल रहा है, दूसरा विविधभारती सुन रहा है, तीसरा FM और चौथा ऑडियो प्लेयर। इसमें रत्तीभर भी झूठ नहीं है।(अब हम सभी नौकरियों के सिलसिले में अलग-अलग शहरों में हैं)

- नीलम शर्मा अंशु,
RJ FM Rainbow, Gold, AIR कोलकाता

samvetswar.blogspot.com ने कहा…

टिप्पणी नं.1 पढ़कर बहुत बुरा लगा (जो रेडियो को दिल से चाहता होगा उसे सचमुच बुरा लगना ही चाहिए यह सुनकर कि रेडियो सुनता कौन है) हलांकि अगले मिनट में ही उन्होंने कमेंटस् बदल लिए हैं और टिप्पणी 1 का जवाब तो टिप्पणी 3 के माध्यम से स्वत: स्पष्ट है। मान भी लिया कि रेडियो की लोकप्रियता में कमी आई है लेकिन FM ने रेडियो की दुनिया ही बदल दी है ख़ास तौर से महानगरों में। लोग गाडियों में, टैक्सियों में, ऑटोज में एफ.एम. लगाए रखते हैं और मेंरे जैसे लोग ऑफिस जाते और लौटते वक्त मोबाइल पर सुनते हैं। आपके आस-पास के शहरों का मैं नहीं कह सकती लेकिन कोलकाता और आस-पास के लोग दीवनगी की हद तक रेडियो एफ.एम. सुनते हैं। उनकी दीवानगी के आलम को मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती। प्रोग्राम में SMS, फोन तो करते ही है चिट्ठियां भी दीवानगी की हद तक ही लिखते हैं। हिन्दी के प्रोग्राम में बांग्ला भाषी श्रोता रोमन हिन्दी में खत लिखने की कोशिश करते हैं। चब तक आकाशवाणी के FM पर हिन्दी प्रोग्राम छायालोक चल रहा होता है लोग दूसरा प्राइवेट चैनेल ट्यून नहीं करते, ऐसा हमारे श्रोता हमें खुद बताते हैं। हम खुद भी प्रोग्राम पर बहुत मेहनत करते हैं।

हमारे कोलकाता में तो आकाशवाणी की उर्दू सर्विस शॉर्ट वेव पर लगती है जो कि स्पष्ट नहीं होती। मैं निजी तौर पर उसे बहुत मिस करती हूँ क्योंकि मैं 1989 से AIR उर्दू सर्विस की श्रोता रही हूँ और कोलकाता आने के बाद ही सुनना छूटा है क्योंकि यहाँ frequency ठीक नहीं आती। अब भी जब मैं दिल्ली या पंजाब जाती हूं तो नियमित रूप से उर्दू सर्विस और विविध भारती के प्रोग्राम सुनती हूँ। कभी हमारे घर का नज़ारा ये होता था कि एक कमरे में TV चल रहा है, दूसरा विविधभारती सुन रहा है, तीसरा FM और चौथा ऑडियो प्लेयर। इसमें रत्तीभर भी झूठ नहीं है।(अब हम सभी नौकरियों के सिलसिले में अलग-अलग शहरों में हैं)

- नीलम शर्मा अंशु,
RJ FM Rainbow, Gold, AIR कोलकाता

samvetswar.blogspot.com ने कहा…

टिप्पणी नं.1 पढ़कर बहुत बुरा लगा (जो रेडियो को दिल से चाहता होगा उसे सचमुच बुरा लगना ही चाहिए यह सुनकर कि रेडियो सुनता कौन है) हलांकि अगले मिनट में ही उन्होंने कमेंटस् बदल लिए हैं और टिप्पणी 1 का जवाब तो टिप्पणी 3 के माध्यम से स्वत: स्पष्ट है। मान भी लिया कि रेडियो की लोकप्रियता में कमी आई है लेकिन FM ने रेडियो की दुनिया ही बदल दी है ख़ास तौर से महानगरों में। लोग गाडियों में, टैक्सियों में, ऑटोज में एफ.एम. लगाए रखते हैं और मेंरे जैसे लोग ऑफिस जाते और लौटते वक्त मोबाइल पर सुनते हैं। आपके आस-पास के शहरों का मैं नहीं कह सकती लेकिन कोलकाता और आस-पास के लोग दीवनगी की हद तक रेडियो एफ.एम. सुनते हैं। उनकी दीवानगी के आलम को मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती। प्रोग्राम में SMS, फोन तो करते ही है चिट्ठियां भी दीवानगी की हद तक ही लिखते हैं। हिन्दी के प्रोग्राम में बांग्ला भाषी श्रोता रोमन हिन्दी में खत लिखने की कोशिश करते हैं। चब तक आकाशवाणी के FM पर हिन्दी प्रोग्राम छायालोक चल रहा होता है लोग दूसरा प्राइवेट चैनेल ट्यून नहीं करते, ऐसा हमारे श्रोता हमें खुद बताते हैं। हम खुद भी प्रोग्राम पर बहुत मेहनत करते हैं।

हमारे कोलकाता में तो आकाशवाणी की उर्दू सर्विस शॉर्ट वेव पर लगती है जो कि स्पष्ट नहीं होती। मैं निजी तौर पर उसे बहुत मिस करती हूँ क्योंकि मैं 1989 से AIR उर्दू सर्विस की श्रोता रही हूँ और कोलकाता आने के बाद ही सुनना छूटा है क्योंकि यहाँ frequency ठीक नहीं आती। अब भी जब मैं दिल्ली या पंजाब जाती हूं तो नियमित रूप से उर्दू सर्विस और विविध भारती के प्रोग्राम सुनती हूँ। कभी हमारे घर का नज़ारा ये होता था कि एक कमरे में TV चल रहा है, दूसरा विविधभारती सुन रहा है, तीसरा FM और चौथा ऑडियो प्लेयर। इसमें रत्तीभर भी झूठ नहीं है।(अब हम सभी नौकरियों के सिलसिले में अलग-अलग शहरों में हैं)

- नीलम शर्मा अंशु,
RJ FM Rainbow, Gold, AIR कोलकाता