शुक्रवार, अगस्त 27, 2010

आकाशवाणी कोलकाता के जन्मदिन पर विशेष- नीलम शर्मा ‘अंशु’

पुराने ज़माने में हमारे पास मनोरंजन के साधन न के बराबर हुआ करते थे। नानी, दादी के क़िस्सों से हम बच्चे खुश हो जाया करते। उनसे राजा-रानी, परियों की कहानियां सुनते-सुनते कब रात को नींद हमें अपने आगोश में ले लेती पता ही न चलता। और, अब वे क़िस्से कहीं पीछे छूट गए हैं क्योंकि आज बच्चों की नानी और दादी भी कहीं बहुत पीछे छूटती जा रही हैं । उन्हें अपने इस ‘छूटने’ का मलाल क़तई नहीं बल्कि (बकौल डॉ कुमार विनोद) उनकी परेशानी का आलम कुछ यूं हैं -

‘बड़ी हैरत में डूबी आजकल बच्चों की नानी है


कहानी की किताबों में न आजकल राजा है न रानी है।’

मुझे अच्छी तरह याद है......बचपन में नानी और दादी का आँचल तो नहीं मिला, हां मां ज़रूर रात को कहानियां सुनाया करती थीं। उनमें राजा-रानी के किस्सों के साथ-साथ पौराणिक कहानियां ज्यादा होतीं। मेरा भाई जब तीन-साढ़े तीन वर्ष का था तो जब तक मां रात को रसोई के काम से फ़ारिग होकर बिस्तर पर आती, वह मुझसे कहा करता कि दीदी तब तक तुम कोई कहानी सुनाओ। मैं जैसे ही सुनाना शुरू करती - इक सी राजा....., वह तुरंत अपने तुतलाते स्वर में कहता – इक नाणी ।

राजा – रानी और परियों की कहानी के साथ हमारे पास मनोरंजन का एक साधन और भी मौजूद था – रेडियो ! जी हां, उस ज़माने में रेडियो ही वह सशक्त माध्यम था, जो मनोरंजन के साथ-साथ सूचनाएं भी देता था। उससे भी बहुत पहले उसकी पहुंच हर किसी के वश की बात नहीं थी। जिस घर में रेडियो होता, उस घर के बाहर लोगों का मजमा इकट्ठा हो जाता। सभी एक जगह बैठकर एक साथ मिलकर सुनते। लोग हैरान होते कि उस डिब्बे में से आखि़र आवाज़ कैसे निकलती है। मेरा रेडियो से पहला परिचय शैशवावस्था में ही हुआ। मेरे पिता जिस कंस्ट्रक्शन कंपनी में कार्यरत थे उनके रसोईये को रेडियो सुनने की बहुत आदत थी। रेडियो का हैंडल पकड़े वह इधर-उधर घूमता रहता, काम भी करता जाता। एक दिन उसी के रेडियो में दिल से संबंधित कोई गाना बज रहा था, वह गाना सुनकर मैंने मेरी मां से तुतलाती हुई आवाज़ में कहा था – 'मम्मी, मम्मी! डीडी (रेडियो) कैंहदा, दिल्ला मेरा ' (मुझे तो याद नहीं घर वाले बताते हैं)। हमारे घर में रेडियो बजाने की अनुमति नहीं थी, हां यह अलग बात है कि घर के सामने डेकोरे़टर्स की दुकानों पर दिन भर फिल्मी गीत बजा करते थे। व्यक्तिगत रूप से रेडियो से जुड़ाव कॉलेज के दिनों में हुआ। भाई साहब ने रेडियो खरीद कर लाकर दिया। तब मैं रेडियो पास रखकर ही पढ़ा करती। परीक्षा की तैयारी भी इसी तरह होती। रेडियो धीमे स्वर में बजता रहता, भले ही उसके कार्यक्रमों की तरफ ध्यान रहता हो या नहीं। कॉलेज का वक्त पंजाब में गुज़रा, उन दिनों पंजाब में आतंकवाद चर्मोत्कर्ष पर था पर हमें उससे कोई मतलब नहीं था। हमारी अपनी ही दुनिया था, आवाज़ के साथियों की दुनिया। वहां ऑल रेडियो दिल्ली की उर्दू सर्विस खूब सुनी जाती थी। प्रसारण भी बहुत स्पष्ट होता था मीडियम वेव पर। तरह-तरह के फ़रमाईशी गीतों के प्रोग्राम, ख़तों के प्रोग्राम, बच्चों के प्रोग्राम, फ़िल्मों से संबंधित तरह-तरह के प्रोग्राम। हम आवाज़ के ज़रिए प्रोग्राम के आर. जे. को पहचाना करते या फिर उनकी प्रस्तुति के विशेष अंदाज़ से भी। बस यहीं से रेडियो से गंभीरता से जुड़ाव हुआ। ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस ज़िंदगी का अहम् हिस्सा बन गई थी 1980 से 86 तक। 1986 के बाद वापिस बंगाल आए तो भी दुआर्स में शॉर्ट वेव पर उसे सुन लेते परंतु 1989 में कोलकाता आने के बाद उर्दू सर्विस का साथ छूट गया क्योंकि यहां शॉर्ट वेव पर उसे ट्यून करने में बहुत मशक्त करनी पड़ती, तिस पर प्रसारण भी स्पष्ट सुनाई नहीं देता। आज भी जब-जब पंजाब जाना होता है तो हम उसे बड़ी शिद्दत से सुनते हैं। रेडियो के जुनून का सिलसला ऐसा रहा कि जब - जब मौका मिलता खाली वक्त में कोलकाता में ऑफिस में भी ड्रॉयर में रख रेडियो सुना करती। इसके बाद 1998 में आकाशवाणी कोलकाता की एफ. एम. सेवा शुरू हुई तो पता चला कि सुबह नौ बजे और शाम छह बजे तक बड़े बढ़िया हिन्दी गीत बजा करते हैं तो उसे सुनने का सिलसिला शुरू हुआ, जो आज तक जारी है। इसी दौरान रेडियो पर घोषणा सुनकर एफ. एम के आकस्मिक आर. जे. के लिए आवेदन किया और अब विगत लगभग ग्यारह वर्षों से खुद ऑल इंडियो रेडियो एफ. एम पर परफार्म कर रही हूं। बल्कि इस तरह रेडियो का वह जु़ड़ाव और मजबूत हो गया। रेडियो से जुड़ा एक क़िस्सा और शेयर करना चाहूंगी। 1990 में दिल्ली रेडियो गई तो वहां अपने क़ालेज के ज़माने में सुने आर. जे. से मुलाक़ात की। रेडियो के रिसेप्शन रजिस्टर में मैंने अपने नाम के साथ सिर्फ़ 6, एस्पलानेड ईस्ट, कोलकाता - 69 लिखा था, अपने ऑफिस का नाम नहीं लिखा था । फिर भी रजिस्टर से प्राप्त अधूरे पते पर ही रेडियो के किसी स्टाफ द्वारा भेजा गया पत्र मेरे ऑफिस में मुझ तक पहुंच गया। उन दिनों तो कोलकाता में मुझे ज़्यादा लोग जानते भी नहीं थे, शहर में आए साल भर हुआ था। रेडियो अब भी मेरे पास ऑफिस ड्रायर में रखा रहता है, यह अलग बात है कि अब सुनने की उतनी फुर्सत नहीं मिलती, ज़रूरी होने पर न्यूज़ बुलेटिन कभी-कभार अवश्य सुन लेती हूं।

रेडियो से जुड़ा यादगार वाक्या : बतौर आर. जे. दो यादगार घटनाओं का ज़िक्र करना चाहूंगी, पहली यह कि मैंने आकाशवाणी की 75वीं वर्षगांठ के मौके पर छायालोक की विशेष तैयारी की थी। मेरा प्रोग्राम 6 बजे से शुरू होना था। उससे पहले लखनऊ केन्द्र से आकाशवाणी के वार्षिक पुरस्कार वितरण से संबंधित लाइव प्रोग्राम का प्रसारण चल रहा था। वह लाइव प्रोग्राम इतना लंबा चला कि मेरे प्रोग्राम का समय भी उसी में कवर हो गया और मैं स्टुडियो में माइक्रोफोन के सामने बैठी इंतज़ार ही करती रह गई। दूसरी घटना है, उन दिनों अभिनेता प्रदीप कुमार साहब अपनी अस्वस्थता के दिनों में कोलकाता में थे। मैंने उन पर पूरे एक घंटे का लाइव शो पेश किया, जिसे उन्होंने अपने आवास पर सुना। उनकी गुज़रे ज़माने की यादें ताज़ा हो गई और उन्होंने सुनकर उस प्रोग्राम को सराहा। यह मेरी विशेष उपलब्धि रही कि इतने बड़े कलाकार ने मेरी परफार्मेन्स को सुना। एफ. एम. से ज़ुड़ने के बाद रेडियो कोलकाता को जितना मैंने जाना चलिए आप को भी बता दूं।
जी हां, 15 अगस्त और 26 जनवरी इतिहास के पन्नों में क्यों दर्ज हैं इससे तो शहर का बच्चा-बच्चा परिचित होगा लेकिन 26 अगस्त के बारे में ही शायद किसी को याद हो। 26 अगस्त 1927 को आकाशवाणी के कोलकाता केन्द्र की स्थापना हुई। बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल सर स्टेनली जैक्सन ने इसकी स्थापना की थी। आरंभ में इसका कार्यालय 1 गरस्टिन प्लेस में (अब बी. बी. डी. बाग़) में था। इसके पश्चात् 15 सितंबर 1958 में इसे इडेन गार्डन के मौजूदा भवन में स्थानांतरित किया गया। मुंबई और कलकत्ते वाले प्रसारण निजी ट्रांसमीटरों से होते थे, बाद में इन ट्रांसमीटरों को सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया। 1 अप्रैल 1930 को ही रेडियो का प्रसारण सरकार के सीधे नियंत्रण में आ गया था। Deptt. of Industries & Labour के अधीन इसका Indian Broadcasting Service नामकरण किया गया। 1 जनवरी 1936 को Indian State Broadcasting Service के दिल्ली केन्द्र की स्थापना की गई। 8 जून 1936 को इसक नामकरण किया गया – All India Radio. पुन: 1938 में इसका नामकरण किया गया - ‘आकाशवाणी’। रवीन्द्रनाथ टैगोर रचित कविता ‘आकाशवाणी’ के आधार पर यह नामकरण किया गया। 1935 तक रेडियो से दो समाचार बुलेटिन प्रसारित होते थे, एक अंग्रेजी में और दूसरा भारतीय भाषा में। 1947 तक आते-आते इनकी संख्या बढकर 74 हो गई। इसके बाद रेडियो की अपनी पत्रिका भी प्रकाशित की जाने लगी, अंग्रेजी में ‘ All India Times’ और बांग्ला में ‘बेतार जगत’। 20 अक्तूबर 1941 को आकाशवाणी को सूचना मंत्रालय में शामिल किया गया। आकाशवाणी से प्रसारित सर्वश्रेष्ठ नाटक, फीचर तथा संगीतप्रधान नाटकों के लिए 1974 से आकाशवाणी के वार्षिक पुरस्कार शुरू किए गए।
हिन्दी प्रसारण : 1954 में आकाशवाणी कोलकाता से हिन्दी सेवा का प्रसारण आरंभ हुआ और 1980 में उर्दू सेवा का। एफ. एम.सेवा भी 1980 से शुरू हुई जिसकी समय-सीमा थी सुबह 7 बजे से 11 बजे तक। 1995 में इस समय-सीमा को बढ़ाकर 24 घंटे कर दिया गया।

हिन्दी एफ. एम : एफ. एम. की हिन्दी सेवा (107 मेगाहर्टज् पर) जून 1998 से शुरू हुई। इसके तहत् फिल्मी गीतों का कार्यक्रम सिर्फ़ शाम को प्रसारित किया जाता था। 18 अगस्त 1998 से यह कार्यक्रम सुबह भी प्रसारित किया जाने लगा। सितंबर 1998 में इसका नामकरण किया गया – ‘छायालोक’ ।

चैनलों का नया नामकरण : 1 सितंबर 2001 को एफ. एम के द्वितीय चैनल (100.2 मेगा.) का प्रसारण शुरू हुआ। अप्रैल 2002 में एफ. एम. के इन दोनों चैनलों का नया नामकरण किया गया क्रमश: रेनबो और गोल्ड। ट्रैफिक संबंधी जानकारी का प्रसारण 16 फरवरी 2002 से हुआ।

रेडियो पर प्रथम : विश्व के प्रथम अनांउसर थे, हंगरी के वुडापेस्ट शहर के एडे शर्टसई। 1901 में उन्होंने प्रथम बार माइक्रोफोन का सामना किया था। वहीं आकाशवाणी कोलकाता की प्रथम महिला एनांउसर थीं - श्रीमती इंदिरा देवी। महिला महल कार्यक्रम की प्रथम संचालिका थी श्रीमती बेला दे।

अभिलेखागार : आकाशवाणी कोलकाता की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर महत्वपूर्ण अभिलेखों को संरक्षित किया गया। आकाशवाणी के पूरे गौरवशाली इतिहास को 52 एपिसोडों में सहेजा गया है। इसके लिए केन्द्रीय अभिलेखागार बनाया गया और आकाशवाणी के प्रोड्यूसर प्रदीप कुमार मित्रा ने लगभग 7250 अभिलेखों को संरक्षित किया। ज्योति बसु, महाश्वेता देवी, शैलेन मन्ना जैसे विशिष्ट और प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों पर तीन-तीन घंटों की रिकॉर्डिंग उपलब्ध है। लोगों की मांग को देखते हुए आंचलिक संगीत पर ज़ोर देते हुए ड्रामा, लोक नाट्य और साहित्य से संबंधित प्रोजेक्ट तैयार किए गए हैं। बंगाल के लोकगीत, भक्ति संगीत, देश भक्ति गीत के साथ-साथ विभिन्न भाषाओं की सर्व भारतीय श्रेष्ठ कहानियों के ‘चिरंतन कौथा’ शीर्षक से 26 एपिसोड तैयार किए गए हैं। लोक कला की श्रृंखला के तहत् विभिन्न थीमों पर सात ऑडियो जात्राओं को संरक्षित किया गया है। लोक नाट्य की श्रृंखला पर आधारित 11 एपीसोड, साहित्य पर 75 तथा बंगाल के साहित्यकारों पर 75 और साहित्यकारों की पुस्तकों के चुनिंदा अंशों पर आधारित ‘चिरंतन’ शीर्षक से 5 मिनटों के 534 धारावाहिकों का निर्माण किया गया है। विज्ञान से संबंधित कार्यक्रमों की श्रृंखला में बंगाल के प्रसिद्ध वैज्ञानिकों पर आधारित ‘लिंटन टू लेजर’ नामक 5 एपिसोड उपलब्ध हैं। नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत से परिचित करवाने के लिए आंचलिक अभिलेखों को संरक्षित कर रिलीज करने में प्रयासरत है आकाशवाणी। इसके तहत् रवीन्द्र संगीत की दो सी डी जारी की गई हैँ।

वर्तमान में आकाशवाणी के एफ. एम. चैनलों सहित पाँच चैनल प्रतिदिन 91 घंटों का प्रसारण प्रस्तुत करते हैं तथा फोन इन कार्यक्रमों के माध्यम से 31 घंटे का।
देशभर में रेनबो चैनल : देश में कोलकाता सहित कुल 12 रेनबो चैनेल हैं - दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बंगलोर, कोयंबटूर, कटक, कोडाइकनाल, लखनऊ, त्रिचुरपल्ली, पंजी, जालंधर।

गोल्ड चैनेल : दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई।

रेडियों का महत्व इस बात में भी है कि कई कलाकारों ने रेडियो पर दिग्गज कलाकारों के गाने को अपना प्रेरणा-स्त्रोत माना। पार्शव गायक सुदेश भोंसले और मुहम्मद अज़ी़ज़ ने कभी अपने साक्षात्कार में इस लेखिका से कहा था कि रेडियो पर रफ़ी और किशोर साहब के गीत सुन-सनुकर ही मैंने गाना सीखा।

आज आकाशवाणी कोलकाता ने अपने सफ़र के 83 वर्ष पूरे कर 84 वें में कदम रखा है। आज भी सुबह मेरा रेनबो पर प्रोग्राम था। मैंने इस अवसर पर कोलकाता से जुड़ी चीजों को शामिल किया। गीतों की शुरूआत कोलकाता के पार्श्व गायक मुहम्मद अज़ीज़ के गीत से की। फिर कोलकातावासी गायिका उषा उत्थुप का गीत रंभा हो... और इसके बाद ऐसे गीत बजाए जिनमें'कोलकाता' शब्द शामिल था। भूपेन्द्र की आवाज़ में फिल्म 'कहकशां' की ग़ज़ल शामिल की जो कि कोलकातवासी शायर जनाब हलीम साबिर द्वारा रचित है। अंत में कोलकाता के ही शायर मुनव्वर राणा के शेर -

'किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई

मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई '

को कोट करते हुए फिल्म 'तारे ज़मीं पर' के गीत मेरी माँ से प्रोग्राम का समापन किया।

6 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

रेडियो आज भी सामयिक है. ताज़ा हवा के झोंके सा लगता है, यात्रा के दौरान इसे सुनना. रिकार्डेड संगीत हर समय नहीं सुना जा सकता, उसकी भी सीमाएं हैं.

Sonal ने कहा…

radio sach mein ek badiya tarika hai apna waqt gujaarne k liye.......

A Silent Silence : Raha Baaki Kya Aa Zara..(रहा बाकी क्या आ ज़रा..)

Banned Area News : Daughter comes first for Jovovich

ZEAL ने कहा…

Beautifully written informative article...thanks.

zealzen.blogspot.com

ZEAL

samvetswar.blogspot.com ने कहा…

आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद।

मो सम कौन ? ने कहा…

टी.वी. की बनिस्बत रेडियो आज भी हमारी पहली पसंद है। लेख बहुत अच्छा लगा आपका, लेकिन एक व्यक्तिगत समस्या आपकी समक्ष रखता हूँ।

शायद 1988-89 की बात है, आकाशवाणी दिल्ली से एक नज़्म सुनी थी। उस समय कालेज से घर आया था और उद्घोषणा हो चुकी थी, इसलिये गायक का नाम नहीं सुन पाया, इतना मालूम है कि कोई मुस्लिम कलाकार थे। उस समय अपनी याददाश्त का इतना भरोसा था कि ज्यादा खोजबीन नहीं की, अब पछताना हो रहा है। नज़्म कुछ इस तरह से थी -
"प्यार की शाम ढली, आशियां दिल का जला,
मुझको आवाज न दे, तेरी दुनिया से चला।

कोई उम्मीद नहीं, कोई अरमान नहीं,
प्यार का दिल में मेरे, कोई तूफ़ान नहीं,
राख का ढेर बना, मेरे ख्वाबों का महल,
हाय बेरंग हुए, आरजुओं के कंवल,
दीप यादों के बुझे, आस दम तोड़ गई,
मेरे होठों की हंसी, मुझसे मुंह मोड़ गई,
मैं तो बरबाद हुआ, हो मगर तेरा भला,
मुझको आवाज न दे, तेरी दुनिया से चला"

शुरुआती लाईन्स बिल्कुल सही हैं, पैरे में कुछ गलतियाँ हो सकती हैं। मैंने बहुत खोजा है इस गीत को, नहीं मिला।
आपका लेख पढ़कर फ़िर से कोशिश की है, आप जुड़ी रही हैं आकाशवाणी से, समयकाल भी लगभग वही है। अगर संभव हो सके तो कुछ जानकारी दीजियेगा, आपके सोर्सेज़ हम जैसे लोगों से तो ज्यादा ही होंगे।
धन्यवाद दे रहा हूँ, अगर गीत मिल जायेगा तो एक बार और धन्यवाद दे दूँगा।
आभार।

नीलम शर्मा अंशु ने कहा…

बहुत-बहुत आभार। रेडियो से इस हद तक जुड़ाव को सलाम। सचमुच बहुत अच्छा लगा। हैरानी की बात तो यह है कि बोल पूरे आपको याद हैं।
चलिए आपके बहाने मेरा भी इन पंक्तियों से परिचय हु गया। सच कहूं तो यह गीत मुझ जाना-पहचाना नहीं लगा हो सकता है तरन्नुम में फिर से सुनने का मौका मिले तो शायद याद आ जाए। ठीक है, तलाश करती हूँ इसे।

कोशिश करूंगी कि आपका धन्यवाद दुबार हासिल करने में सफल हो पाऊं।